8/14/2012
तुम
8/28/2011
कुछ तो करना है ....
2/22/2009
एक ख़याल
जब शब्द
अधिक महत्वपूर्ण होने लगें
और भावनाएं गौण
तो कोलाहल में भी
बोलने लगता है मौन
ऐसे में
शब्दों के अर्थ बदल लेना ही उचित है ।
---
2/05/2009
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं
अक्सर जमाने की
ज़बरदस्ती ओढाई गई
तहज़ीब की चाशनी में
फ़िसल के लौट जाते हैं ,
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ?
तुम्हारे होठों के गोल होने से शुरु हो कर
शब्दों के मेरे कान तक पहुँचने का समय
एक युग के समान लगता है ,
किताबों में पढा था ,
प्रकाश की गति ध्वनि से तेज हुआ करती है ,
शायद इसीलिये
तुम्हारे आंखो से कहे बोल
तुम्हारी आवाज़ से पहले ही
मेरी आंख की कोर तक पहुँच कर ठहर जाते है ।
तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ?
6/16/2008
मुक्तक
मीठी यादों की एक निशानी देखूँ
जज़्बों में पहचान पुरानी देखूँ
मैं जिसमे किरदार हुआ करता था
तेरे चेहरे पे वो कहानी देखूँ ।
3/27/2008
एक संवाद बेजी के साथ .....
कल बेजी की कविता पढी तो कुछ लिखने का मन हुआ ।
बेजी की अनुमति से प्रस्तुत है पहले उस की कविता इस रंग में और फ़िर मेरी कुछ पँक्तियां इस रंग में :
दूरी
किसी वृत्त में
दो बिंदु की तरह मिले....
पास पास
मैं आगे थी...
वो पीछे...
अजीब जिद थी
कि बीच का फासला
मैं तय करूँ......
और बस यूँ ही
फासले बढ़ गये
चलो यूँ कर लें....
अगर तुम्हारी ज़िद है
कि फ़ासला मै ही तय करूँ ,
तो वायदा करो
तुम मेरा इन्तज़ार करोगे ,
मैं ही कुछ तेज चल लेती हूँ
वृत्त में दूरियां
पहले तो बढेंगी
फ़िर धीरे धीरे
मैं तुम में विलीन हो जाऊँगी ।
परिधि की अगली परिक्रमा में
मेरे साथ चलोगे ना ?
3/21/2008
कभी लिखा था ...
जज़्बातों की उठती आँधी
हम किसको दोषी ठहराते
लम्हे भर का कर्ज़ लिया था
सदियां बीत गई लौटाते ।
२.
वो लड़ना झगड़ना रूठना और मनाना
किस्से सभी ये पुराने हुए हैं
वो कतरा के छुपने लगे हैं हमीं से
महबूब मेरे सयाने हुए हैं ।
11/12/2007
जाने सूरज जलता क्यों है
जाने सूरज जलता क्यों है
इतनी आग उगलता क्यों है
रात हुई तो छुप जाता है
अंधियारे से डरता क्यों है
सुबह का निकला घर न आया
आवारा सा फ़िरता क्यों है
सुबह शाम और दोपहरी में
अपनें रंग बदलता क्यों है
अगर सुबह को फ़िर उगना है
तो फ़िर शाम को ढलता क्यों है
11/09/2007
दिवाली
पुरखो का वरदान दिवाली
अपनो से पहचान दिवाली
एक बरस में ही आती है
दो दिन की मेहमान दिवाली
हंसी खुशी की एक लहर है
मीठी सी मुस्कान दिवाली
लड्डू, पेड़े, गुंझिया बरफ़ी
इक मीठा पकवान दिवाली
जीवन की आपाधापी में
प्रश्न एक आसान दिवाली
नया बरस खुशियां लायेगा
कुछ ऐसा अनुमान दिवाली
चांद सितारे अंबर में हैं
धरती का अभिमान दिवाली
अपनों से जब दूर हो बैठे
लगती है सुनसान दिवाली
मधुर क्षणों की अनुभूति ये
कविता का उन्वान दिवाली
-------
दीप पर्व की मंगल कामनाओं के साथ :
रजनी-अनूप
अनुभव-कनुप्रिया
8/25/2007
एक ऐब्सट्रैक्ट सी रुबाई
संभावनाएं मेरे गीतों से जन्म लिया करती हैं
रात का मरुस्थल सपनों के धरातल पर उनींदा सा क्यो पड़ा है
रात आलिंगन से शुरु होती है, रात आलिंगन में खत्म हुआ करती है।
4/14/2007
कौन कहता है
भाग्य की रेखाएं
बदल नहीं सकती ?
मुझे याद है
जब तुमने पहली बार
अपनी कोमल उँगलियों से
मेरी हथेली को कुरेदा था ,
कौन कहता है
भाग्य की रेखाएं
बदल नहीं सकती ?
4/06/2007
मुक्तक
वो मुझ से दूर भी अगर जाये तो जाये कैसे
वो मेरी रूह की हर रग रग में शामिल है
वो मुझ से बदन को चुराये तो चुराये कैसे ?
1/30/2007
दूसरी हत्या
यूँ तो कविता को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिये लेकिन इस कविता के बारे में कुछ कहना ज़रूरी है । २ अक्टूबर १९७८ के दिन एक सच्ची घटना पर प्रतिक्रिया के रूप में यह लिखी गई थी । उस दिन दो राजनैतिक दलों के बीच राजघाट पर इस बात पर झगड़ा हुआ कि महात्मा गांधी की समाधि को पहले कौन धोयेगा ? लाठी , पत्थर और गोलियों के साथ अहिंसा के पुजारी की समाधि पर हिंसा का नंगा खेल खेला गया । एक आहत मन से लिखी थी यह कविता और उस समय बहुत संतोष मिला था , इसे लिख कर ।
-
बापु ,
देखो आज हम
तुम्हारी समाधि धोने आये हैं,
ये बात अलग है कि साथ में
लाठी, पत्थर और आँसू गैस के खिलौने लाये हैं,
लेकिन सच सच बतायें बापु,
ये समाधि को धोना वोना
तो बेकार की बात है ,
अरे हम तो इस युग के नाथू राम गोड़से हैं
जो अपना अपना अधूरा काम करनें आये हैं
शरीर से तो तुम्हे कब का मार चुके
आज तुम्हारी आत्मा तमाम करने आये हैं ।
1/10/2007
मुक्तक
अजनबी वेदना है सहूँ ना सहूँ
मुस्कुराते हुए गीत और छन्द में
अनमनी सी व्यथा है कहूँ ना कहूँ ?
12/23/2006
दो मुक्तक
हौले हौले ज़रा सा सुरूर आ गया
तुम जो बाँहों में आईं लजाते हुए
हम को खुद पे ज़रा सा गुरूर आ गया
---
ज़िन्दगी गुनगुनाई , कहो क्या करें ?
चाँदनी मुस्कुराई, कहो क्या करें ?
मुद्दतों की तपस्या है पूरी हुई
आप बाँहों में आईं, कहो क्या करें ?
12/02/2006
दो ताजा शेर
पहले तुझे आवाज़ दीं फ़िर खुद ही ज़वाब दिया है ।
---
छू लिया आ कर के तूने इस तरह मेरा वज़ूद
साँस भी तेरी मुझे अब अपने जैसी ही लगे है ।
11/19/2006
तुम जब से रूठी हो
मेरे गीत अपना अर्थ खो बैठे हैं
मेरे ही गीत मुझ से ही खफ़ा हो
मुझ से दूर जा बैठे हैं
माना कि तुम मुझ से नाराज़ हो
लेकिन मेरे गीतों से तो नहीं
क्या तुम उनको भी मनानें नही आओगी ?
मेरे गीत फ़िर से नया अर्थ पानें को बेताब हो रहे हैं ।
10/22/2006
एक मुक्तक
दिल में गड़ जाये गहरी, निशानी लिखो
ख्वाब की आबरु को बचाना ही है
उन अधूरे पलों को, कहानी लिखो ।
10/20/2006
शुभ कामनाएं
स्नेह की सरिता यूँ ही बहती रहे
आप जैसे दोस्तों का साथ हो
ज़िन्दगी यूँ ही सदा हँसती रहे
दीप पर्व की ढेर सारी शुभ कामनाओं के साथ :
10/09/2006
पाँच मुक्तक .... तुम्हारे लिये
प्रणय की प्रेरणा तुम हो
विरह की वेदना तुम हो
निगाहों में तुम्ही तुम हो
समय की चेतना तुम हो ।
२.
तृप्ति का अहसास तुम हो
बिन बुझी सी प्यास तुम हो
मौत से अब डर नहीं है
ज़िन्दगी की आस तुम हो ।
३.
सपनों का अध्याय तुम्ही हो
फ़ूलों का पर्याय तुम्ही हो
एक पंक्ति में अगर कहूँ तो
जीवन का अभिप्राय तुम्ही हो ।
४.
सुख दुख की हर आशा तुम हो
चुम्बन की अभिलाशा तुम हो
मौत के आगे जाने क्या हो
जीवन की परिभाषा तुम हो ।
५.
ज़िन्दगी को अर्थ दे दो
इक नया सन्दर्भ दे दो
दूर कब तक यूँ रहोगी
नेह का सम्पर्क दे दो ।
9/25/2006
कोई शब्द नहीं है ...
प्रत्यक्षा नें एक पुरानी कविता की याद दिलाई तो ईकविता के झरोखे से जा कर वह कविता भी निकाली जिस की प्रतिक्रिया के रूप में यह कविता लिखी गई थी ।
प्रत्यक्षा की कविता पहले और फ़िर अपनी दे रहा हूँ :
बात तुम से कहनें के लिये
मैं खोलती हूँ
शब्दों के पिटारे
पर उड़ जाते हैं कभी
तितली बन कर
एक फ़ूल से
फ़ूल दूसरे,
और कभी हाथ आई
मछलियों की तरह
फ़िसल जाते हैं
गिरफ़्त से
तुम्ही कहो
मैं क्या करूँ
तुम तक पहुँचनें को
पास मेरे अब
कोई शब्द नहीं
---
प्रत्यक्षा
अब समझ आया है मुझ को ,
हर फ़ूल में क्यों आ रही थी तेरी खुशबू ,
तितलिओं नें काम ये अच्छा किया है ।
और वो नदी जो
तुम्हारे गाँव से
मेरे घर तक आती है
सुना है
रात उस में खलबली थी
मछलियां आपस में कुछ बतिया रहीं थी
कुछ बात कह कर आप ही शरमा रहीं थी
क्या हुआ गर बात तुम जो कह न पाई
शब्द ही तो प्रेम की भाषा नहीं है ?
--
अनूप
8/31/2006
दो पंक्तियाँ :
तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो
स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को मह्काती हो ।
8/17/2006
अहसास
मैं एक प्यासी लहर की तरह
तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ
तुम तो चट्टान की तरह
वैसी ही खड़ी रहती हो
मैं ही हर बार तुम्हे
बस छू के लौट जाता हूँ
8/09/2006
रिश्ते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते
उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे अपनी उपमाएं
होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे
7/30/2006
दो मुक्तक
रात इक शबनमी है चले आइये
आँसुओं में नमी है चले आइये
अब उजाला कहीं दीख पड़ता नहीं
चाँदनी की कमी है चले आइये ।
२.
नज़ारे बेमिसाल देखे हैं
हादसे और कमाल देखे हैं
मैं ढूँढ रहा हूँ हल जिनका
तेरी चुप में सवाल देखे हैं ।
6/29/2006
6/26/2006
अगले खम्भे तक का सफ़र
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,सड़क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब चलते चलते
थक जाता था,
तुम आंखें बन्द कर के,
उँगलियों पर
कुछ गिननें का बहाना कर के
कहती थीं ,
बस उस अगले खम्भे तक और ।
आज बरसों के बाद
मैं अकेला ही
उस सड़क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब निगाह से देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता पूछ रहे हैं ,
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा इन्तजार कर रही होगी !
6/22/2006
प्रत्यक्षा से संवाद
एक टुकडा छत
वृक्ष की जडों के खोह में
अँधेरा कुलबुलाता था
थोडी सी रौशनी
मुट्ठी भर ज़मीन
और एक टुकडा छत
बस इतना ही काफी है
अँधेरे को अपने
काबू में करने के लिये,
मेरी छत
वहाँ से शुरु होती है
जहाँ से तुम्हारी
ज़मीन
खत्म होती है
रौशनी का
एक गोल टुकडा
बरस जाता है
किरणे बुन लेती हैं
अपनी दीवार
और हमारा घर
धूप ,साये, परिंदो
और बादल से
होड लगाता
झूम जाता है
हमारी आँखों में
एक टुकडा छत
वृक्ष की जडों के खोह में
कभी कभी इच्छा होती है
अपनें पैरों के नीचे की जमीन को
खिसका कर
वहाँ तक पहुँचा दूँ
जहाँ से तुम्हारी छत शुरु
होती है,
वो जमीन
जिस पर मेरे पाँव
अब भी टिके हुए हैं
और जिस पर हम नें
मिल कर ख्वाब देखे थे,
वो हसीन ख्वाब आज भी
अगरबत्ती की तरह सुलग रहे है,
पता नहीं खुशबु
तुम्हारी छत तक पहुँची
या नहीं ?
मेरी छत और तुम्हारी छत
की मुंडेर अब बराबर है
तभी तुम्हारी खुशबू
पहुँच जाती है
मुझ तक
मैं बारबार
नंगे पाँव भागकर,
छत पर क्यों आ
जाती हूँ
ये समझ गये हो न
अब !
मुंडेर चाहे
छत के बीच में हो
या सम्बन्धों में,
अच्छी नही लगती ।
छत की मुंडेर तो
लाँघना आसान है
लेकिन ....
तुम भी अपने
रोशनी के
गोल टुकडे से
पूछ कर देखो ना ?
मैंने
रौशनी के उस
गोल टुकडे को
हल्के से
फूँक दिया है
तुम्हारी तरफ
अब तुम्हारा
चेहरा भी
खिल गया है
मेरी तरह
वो रोशनी का
गोल टुकड़ा
क्षितिज से
उगता हुआ
जब मेरी खिड़की
पर आया
तो उस में
हर रोज़ से
कुछ ज्यादा
चमक थी ।
जानता हूँ
तुम्हारा घर
पूरब की ओर है,
क्या तुम
आज सुबह
जल्दी उठ गई थी ?
मैं रात सोई ही
कब थी
खिडकी से चेहरा टिकाये
अंधेरी रात में
कहीं दूर जो
दिया सा टिमटिमाता था
उसे ही देखती रही
सोचती रही
गुनती रही
शायद
तुम भी
ऐसे ही
अपनी खिडकी से
चेहरा टिकाये
मेरी खिडकी की तरफ
देखते होगे
टिमटिमाते हुए
दिये को
मैं भी
बहुत देर तक
देखता रहा
मन बहुत उदास सा था,
लेकिन फ़िर
तुम्हारी खिड़की की ओर
नज़र पड़ी,
तो बुझते हुए दिये
की लौ
अचानक तेज सी
लगने लगी ...
5/03/2006
दो कविताएं
कल रात
तुम मेरे
सपनों में
आई थीं ,
वरना
सुबह सुबह
मेरी आँखो की
नमी का मतलब
और क्या
हो सकता है ?
----
चलो
अब उठ जाओ
और
जमानें को
अपनें चेहरे की
ज़रा सी रोशनी दे दो
देखो
सूरज खुद
तुम्हारी खिड़की पर
तुम से रोशनी
मांगनें आया है ।
1/22/2006
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ...
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ।
आओ न तुम , तो मर्जी तुम्हारी
बड़े प्यार से पर बुलाया है मैंनें ।
लिखा ओस से जो तेरा नाम ले के
वही गीत तुम को सुनाया है मैंने ।
जीवन की सरगम तुम्ही से बनी है
तुझे नींद में गुनगुनाया है मैंने ।
मेरे आँसुओं का सबब पूछते हो
कतरा था यूँ ही बहाया है मेंने ।
1/14/2006
सुनो ..... (दो कविताएं)
अब अपनी नज़रें उठाओ
और पाँव के अँगूठे से
जमीन को कुरेदना बन्द करो ,
मैं समझ गया पगली
लेकिन कोई ऐसे भी
अपने दिल की बात
कहता है ?
-----
सुनो ,
तुम जानती हो
मेरा अस्तित्व
तुम से शुरू हो कर
तुम पर खत्म होता है
फ़िर बता सकोगी
मुझे मेरा विस्तार
अनन्त सा क्यों लगता है ?
12/17/2005
आशंका
बचपन से पले विश्वासों को
क्षण भर में
काँच के गिलास की तरह
टूट कर बिखरते देखता हूँ ।
सुना है जीने के लिये
कुछ मूल्यों और विश्वासों
का होना ज़रूरी है,
इसलिये मैं
एक बार फ़िर से लग जाता हूँ
नये मूल्यों और विश्वासों
को जन्म देनें में
ये जानते हुए भी
कि इन्हें कल फ़िर टूटना है ।
ये सब तब तक तो ठीक है
जब तक मेरा स्वयं
अपनें आप में विश्वास कायम है,
लेकिन डरता हूँ
उस दिन की कल्पना मात्र से
जब टूटते मूल्यों और विश्वासों
की श्रंखला में
एक दिन
मैं अपनें आप में
विश्वास खो बैठूँगा ।
---
11/30/2005
दो मुक्तक
तेरी मय का, तेरे रूप का कदरदान अभी बाकी है
इस तरह कैसे उठ जाऊँ कहानी अधूरी छोड़ कर ऐसे
तूनें रुख से नकाब उठाया है मेरा इम्तहान अभी बाकी है ।
----
महफ़िल में थिरकनें को मचलता साज़ काफ़ी है
दिल में गहरी उतरने को तेरी आवाज़ काफ़ी है
नहीं संकोच कर साकी छीन ले जाम मदिरा का
मुझे मदहोश करनें को तेरा अंदाज़ काफ़ी है ।
---
11/21/2005
एक ज्यामितीय कविता
एक ही दिशा में
न जाने कब से चलती हुई
दो समान्तर रेखाएं हैं ।
आओ क्यों न इन
रेखाओं पर
प्यार का एक लम्ब डाल दें ?
मैं इसी लम्ब के
घुटनें पकड़ पकड़
शायद तुम तक
पहुँच सकूँ !
अनूप
फ़ुरसतिया जी ! दूसरी पँक्ति पर विशेष ध्यान दें :-)
11/19/2005
10/07/2005
एक गज़ल फ़िर से .....
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परिधि के उस पार देखो
इक नया विस्तार देखो ।
तूलिकायें हाथ में हैं
चित्र का आकार देखो ।
रूढियां, सीमा नहीं हैं
इक नया संसार देखो
यूं न थक के हार मानो
जिन्दगी उपहार देखो ।
उंगलियाँ जब भी उठाओ
स्वयं का व्यवहार देखो
मंजिलें जब खोखली हों
तुम नया आधार देखो ।
हाँ, मुझे पूरा यकीं है
स्वप्न को साकार देखो ।
---------
9/13/2005
एक मुक्तक
ये भी माना कि तेरे प्रश्न का समाधान नहीं हूँ मैं
लेकिन तुम्हारी प्रीति के आमँत्रण का मतलब नहीं समझूँ
मेरी बात मानों इतना नादान नहीं हूँ मैं ।
अनूप
8/28/2005
तुम ने खुशबु की तरह ......
शुरुआत तो गज़ल की कोशिश से हुई थी लेकिन बहर और वज़न सब गलत हैं । बस जो ठीक लगे , वही समझ कर पढ लें :
तुम ने खुशबु की तरह मुझ को चुराया होगा
एक अरसा लमहे में बिताया होगा ।
मैं तुम्हे ढूँढता रहा गुलशन गुलशन
तुम नें फ़ूलों में कहीं खुद को छुपाया होगा ।
मैं तो ख्वाब की मानिंद गुजर जाता हूँ
अपनी पलकों में मुझे तुम ने सजाया होगा ।
जब किसी ने कहीं पे मेरा नाम लिया
तुम नें उँगली में दुपट्टॆ को घुमाया होगा
तुम्हें न देखूँ अगर तो, दर्द उठता है कहीं
तुम नें भी टीस को हौले से दबाया होगा ।
अनूप भार्गव
7/20/2005
7/09/2005
प्रत्यक्षा की कुछ पँक्तियों पर ....
सीने से निकल के दम गया था ,मुद्दतों हुए
कानों में जो आवाज़ उनकी पडी दम फिर निकल गया
इस पर अर्ज़ किया है ..
कुछ तो रहा होगा भुलाये रिश्तों में
दम भी निकल रहा है आज किश्तों में ।
अनूप
7/01/2005
समाधान ......
और तर्क की
ज्यामिती के दायरे
में कैद ज़िन्दगी
एक कठिन समीकरण
बन गई थी ।
तुम चुपके से आईं
और मेरे कान में
प्यार से
बस इतना ही कहा
'सुनो' .....
मैं मुस्कुरा दिया
और अचानक,
ज़िन्दगी के
सभी कटिन प्रश्न
बड़े आसान
से लगनें लगे ।
---
अनूप
6/28/2005
6/26/2005
यूँ ही बैठे बैठे .......
सचमुच मर गये हो या नया कोई तमाशा है .........
6/24/2005
आरती का दिया है .....
आरती का दिया है तुम्हारे लिये
ज़िन्दगी को जिया है तुम्हारे लिये
एक अरसा हुआ इस को रिसते हुए
ज़ख्म फ़िर भी सिया है तुम्हारे लिये
पाप की गठरियाँ तो हैं सर पे मेरे
पुण्य जो भी किया है तुम्हारे लिये
मैनें थक के कभी हार मानी नहीं
हौसला फ़िर किया है तुम्हारे लिये
जिन्दगी को हसीं एक मकसद मिला
साँस हर इक लिया है तुम्हारे लिये
6/21/2005
अस्तित्व
मैनें कई बार
कोशिश की है
तुम से दूर जानें की,
लेकिन मीलों चलनें के बाद
जब मुड़ कर देखता हूँ
तो तुम्हें
उतना ही
करीब पाता हूँ
तुम्हारे इर्द गिर्द
व्रत्त की परिधि
बन कर
रह गया हूँ मैं ।
Asking for a Date
मैं और तुम
व्रत्त की परिधि के
अलग अलग कोनों में
बैठे दो बिन्दु हैं,
मैनें तो
अपनें हिस्से का
अर्धव्यास पूरा कर लिया,
क्या तुम
मुझसे मिलनें के लिये
केन्द्र पर आओगी ?
6/07/2005
सोचता हूँ ...
ये मेरी देह महकी आज चन्दन सी अचानक क्यों
तुम्हारी साँस चुपके से बदन को छू गई होगी ।
हुए हैं ख्वाब क्यों मेरे अचानक और भी मीठे
तुम्हारी नींद , पलकों मे मेरी, आ सो गई होगी ।
5/24/2005
एक और गीतिका
अर्थ जब खोने लगे
शब्द भी रोने लगे ।
जब वो आदमकद हुए
सब उन्हें बौने लगे ।
ज़ख्म न देखे गये जब
अश्रू से धोने लगे ।
एक जज़्बा था अभी तक
आप तो छूने लगे ।
कब तलक ये ख्वाब देखूँ
वो मेरे होने लगे ।
कब कहानी मोड़ ले ले
आप तो सोने लगे ।
अनूप
२० मई २००५
4/17/2005
4/04/2005
Just the Begining
Bear with me. Things can only get better from this point onwards. :-)
